बैटरी के दाम घटेंगे, EV सस्ते होंगे – सरकार ने खनिजों पर रॉयल्टी घटाकर बड़ा दांव खेला

बैटरी के दाम घटेंगे –11 नवंबर को केंद्रीय कैबिनेट ने चार critical minerals – ग्रेफाइट, सीज़ियम, रुबिडियम और जिरकोनियम – की रॉयल्टी दरें घटा दीं। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि रॉयल्टी घटी, बल्कि यह है कि इससे आपकी जेब और भारत की इकॉनमी पर क्या फर्क पड़ेगा।

क्यों उठाया गया यह कदम

देखिए, भारत अभी EV बैटरी के लिए जरूरी ग्रेफाइट का 60 फीसदी हिस्सा बाहर से मंगाता है। चीन और अफ्रीका पर निर्भरता है। जब दुनिया green energy की तरफ भाग रही है, तब हम बाहर से माल मंगाकर अपनी EV इंडस्ट्री चला रहे थे। यह supply chain risk था, cost risk था, और सबसे बड़ी बात – strategic risk था।

सरकार ने समझा कि अगर खदान मालिकों पर रॉयल्टी का बोझ कम होगा, तो वे mining में invest करेंगे। ग्रेफाइट की रॉयल्टी अब price के हिसाब से चार्ज होगी – high quality वाले ग्रेफाइट पर दो फीसदी और कम quality वाले पर चार फीसदी। पहले यह per tonne basis पर fixed था, जिससे flexibility नहीं थी।

सीज़ियम और रुबिडियम जैसे rare minerals जो GPS systems, medical equipment, fiber optics और night vision devices में काम आते हैं – इन पर भी रॉयल्टी सिर्फ दो फीसदी रखी गई। जिरकोनियम, जो nuclear energy और aerospace में critical है, उस पर सबसे कम – सिर्फ एक फीसदी।

तो क्या होगा अब

पहली बात – सितंबर में जो sixth tranche auction का notice निकला था, उसमें पांच ग्रेफाइट blocks, दो रुबिडियम blocks और एक-एक सीज़ियम और जिरकोनियम block है। अब जब रॉयल्टी clear हो गई, तो bidders को पता है कि उन्हें कितना देना होगा। यानी auction में ज्यादा participation आएगी, बेहतर bids आएंगी।

दूसरी बात – जब ये minerals India में ही निकलेंगे तो साथ में lithium, tungsten, rare earth elements और niobium जैसे associated minerals भी unlock होंगे। यह bonus है जो अपने आप मिलेगा।

तीसरी और सबसे important बात – EV manufacturing का cost कम होगा। Battery की कीमत में ग्रेफाइट का बड़ा हिस्सा होता है। अगर यह locally मिलेगा तो import duty, transportation cost, और supply chain delays – सब बचेंगे। मतलब आने वाले दो-तीन साल में electric vehicles सस्ती होंगी।

रोजगार और आत्मनिर्भरता का खेल

फिलहाल देश में नौ ग्रेफाइट mines चल रही हैं और 27 blocks auction हो चुके हैं। GSI और MECL ने 20 और blocks hand over किए हैं जो जल्द auction होंगे। लगभग 26 blocks exploration के stage में हैं। इसका मतलब है कि अगले पांच साल में हजारों jobs mining sector में आएंगी – engineers से लेकर skilled workers तक।

जो companies अब तक सोच रही थीं कि India में critical minerals की mining risky है क्योंकि रॉयल्टी structure unclear था, उनके लिए रास्ता साफ हो गया। FDI आएगी, technology transfer होगा, और भारत की green energy ambitions को मजबूती मिलेगी।

Global competition में भारत की positioning

दुनिया में electric vehicle revolution चल रहा है। 2030 तक global EV market करीब 800 billion dollar से ज्यादा का हो जाएगा। अगर भारत को इस race में आगे रहना है तो raw material security जरूरी है। चीन पहले ही critical minerals के production और processing में दुनिया में नंबर one है। यूरोप और अमेरिका अपने supply chains diversify कर रहे हैं।

भारत के पास अब मौका है कि वह सिर्फ consumer न बने, बल्कि producer और exporter भी बने। यह royalty rationalization उसी दिशा में पहला concrete कदम है।

आखिरी बात

यह decision सिर्फ mining policy नहीं है – यह economic strategy है। Green energy, manufacturing growth, export potential, और strategic autonomy – सब कुछ इन छोटे-छोटे minerals से connected है। अगले दो साल में जब पहली domestic ग्रेफाइट से बनी EV batteries Indian vehicles में लगेंगी, तब यह फैसला अपना असली impact दिखाएगा।

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